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Complete information about the Domicile policy of Jharkhand based on the Khatian of 1932

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हेमंत सोरेन सरकार शुक्रवार को विधानसभा में दो महत्वपूर्ण विधेयक पेश करने वाली है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इन विधेयकों को पेश करेंगे। झारखंड स्थानीय व्यक्तियों की परिभाषा और परिणामी सामाजिक, सांस्कृतिक और अन्य लाभों को ऐसे स्थानीय व्यक्तियों तक विस्तारित करने के लिए विधेयक 2022 पहले विधेयक का नाम है। गौरतलब है कि झारखंड में स्थानीयता का मुद्दा जनभावनाओं से जुड़ा है। लंबे समय से इसकी मांग की जा रही है। झामुमो ने 2019 के विधानसभा चुनाव में इसे अपने मेनिफेस्टो में भी शामिल किया था। 

1932 का खतियान-सर्वे बना स्थानीयता का आधार

गौरतलब है कि झारखंड में स्थानीयता को परिभाषित करने के लिए 1932 के सर्वे और खतियान को महत्वपूर्ण आधार बनाया गया है। इस विधेयक को झारखंड स्थानीय व्यक्तियों की परिभाषा और परिणामी सामाजिक, सांस्कृतिक और अन्य लाभों को ऐसे स्थानीय व्यक्तियों तक विस्तारित करने के लिए अधिनियम 2022 कहा जायेगा। इसका विस्तार संपूर्ण झारखंड राज्य में होगा। यह अधिनियम भारत का संविधान 9वीं अनुसूची में शामिल होने के बाद प्रभावी होगा। बता दें कि जिस खतियान आधार पर स्थानीयता की परिभाषा तय होती है उसकी 3 प्रतियां होती हैं। एक प्रति उपायुक्त के पास रहती है। दूसरी प्रति अंचल कार्यालय में होती है और तीसरी प्रति रैयत के पास। मूल खतियान वैसे तो कैथी, बांग्ला अंग्रेजी में है। इसका हिन्दी अनुवाद किया गया है।


झारखंड के स्थानीय व्यक्ति की परिभाषा क्या है

स्थानीय व्यक्तियों का अर्थ झारखंड का अधिवास( डोमिसाइल) होगा जो एक भारतीय नागरिक है और झारखंड की क्षेत्रीय और भौगोलिक सीमा के भीतर है और उसके या उसके पूर्वजों का नाम 1932 या उससे पहले के सर्वेक्षण /खतियान में दर्ज है। भूमिहीन व्यक्तियों के मामले में ,स्थानीय व्यक्ति की पहचान ग्रामसभा द्वारा संस्कृति, स्थानीय रीति-रिवाज, परंपरा आदि के आधार पर की जायेगी। जो व्यक्ति या उसके पूर्वज 1932 या उसके पूर्व झारखंड में वास करते हों परंतु खतियान के अनुपलब्ध रहने या अपठनीय होने के कारण या किसी वैध कारण से जमीन के कागजात नहीं दिखा पा रहे हों उनके मामले में ग्राम सभा को उनके स्थानीय निवासी होने की पहचान करने का अधिकार होगा। 

इस अधिनियम के लागू होने से क्या लाभ होगा

इस अधिनियम के तहत परिभाषित स्थानीय व्यक्ति सामाजिक सुरक्षा, सामाजिक बीमा और रोजगार/बेरोजगारी के संबंध में राज्य की सभी योजनाओं और नीतियों के हकदार होंगे और उन्हें अपनी भूमि, रोजगार या कृषि ऋण/ऋण आदि पर विशेषाधिकार और संरक्षण प्राप्त होगा। इस अधिनियम के तहत परिभाषित स्थानीय व्यक्ति प्राथमिकता के आधार पर अपने भूमि रिकॉर्ड को बनाए रखने के भी हकदार होंगे जैसा नियम के तहत निर्धारित और विनियमित किया जा सकता है। इस अधिनियम के तहत परिभाषित स्थानीय व्यक्ति राज्य में व्यापार और वाणिज्य के लिए विशेष रूप से पारंपरिक और सांस्कृतिक उपक्रमों से संबंधित स्थानीय वाणिज्यिक सांस्कृतिक उपक्रमों और स्थानीय झीलों/ नदियों / मत्स्य पालन / पर अधिमान्य अधिकार के भी हकदार होंगे। इस अधिनियम के तहत परिभाषित स्थानीय व्यक्ति कृषि ऋण के मामले में राज्य के लाभों के हकदार होंगे जैसा कि नियमों के तहत निर्धारित किया जा सकता है।

1932 पर आधारित स्थानीयता का विरोध क्यों? 

हालांकि, ऐसा नहीं है कि इस विधेयक का झारखंड के 100 फीसदी लोगों ने समर्थन ही किया हो। विपक्ष ने तो खैर स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा लेकिन सत्तापक्ष की तरफ से ही इस पर सवाल उठाए गए हैं। सत्तारूढ़ महागठबंधन में शामिल कांग्रेस पार्टी के ही कई नेताओं ने इस पर आपत्ति व्यक्त की। कुछ मंत्रियों ने खुलकर विरोध नहीं किया तो समर्थन भी नहीं किया। पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने कहा कि यदि 1932 के खतियान पर आधारित स्थानीय नीति बनी तो पूरा कोल्हान इसके दायरे से बाहर हो जाएगा। ऐसा ही मत सांसद गीता कोड़ा का भी है। ओबीसी आरक्षण मंच के कैलाश यादव ने भी इसका विरोध किया। मुख्य विपक्षी, भारतीय जनता पार्टी ने ना तो खुलकर विरोध किया और ना ही स्वागत। बीजेपी के समय जब मुख्यमंत्री रघुवर दास थे तब 2016 में 1985 को आधार मानकर स्थानीयता पारिभाषित की गई थी। इसी आधार पर नियोजन नीति भी तैयार हुई थी। 

किन जिलों में कब हुआ अंतिम सर्वे सेटलमेंट? 

1932 को लेकर कुछ लोगों की आपत्ति क्यों है? दरअसल, झारखंड के कुछ जिलों में 1933 में अंतिम बार सर्वे सेटलमेंट शुरू हुआ और 1935 में पूरा हुआ। कुछ जिलों में 1938 में सर्वे सेटलमेंट पूरा हुआ। कुछ जिलों में 1955 में। जानने वाली बात है कि रांची, खूंटी, सिमडेगा और गुमला में 1975 में सर्वे सेटलमेंट की प्रक्रिया शुरू हुई लेकिन अभी तक पूरी नहीं हुई। धनबाद और बोकारो जिले में 1981 में सर्वे शुरू हुई लेकिन पूरा नहीं हुआ। पलामू, गढ़वा, साहिबगंज, दुमका, पाकुड़, गोड्डा, देवघर और जामताड़ा में 1976-77 में सर्वे का काम शुरू हुआ लेकिन अभी तक पूरा नहीं हुआ। ऐसे में बड़ा सवाल है कि यहां रहने वाले नागरिकों का क्या होगा। हालांकि, ग्राम सभा इसमें एक विकल्प है। 

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